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अनित्य  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
वि.
सं.
1.वह जो खुद कार्य रूप हो तथा जिसका कारण कोई हो, अर्थात्‌ जो सदैव एक सा न रहे, जैसे संसार।
  • उदा.--ए संसार अनित्य आदि सविकार उचारै।--रा.रू.
2.जो स्वयं कारण रूप हो और कार्य रूप न हो, असत्य, झूठा।
  • उदा.--निरवांण नित्य अंतर अनित्य।--ऊ.का.
3.विनाशी, अस्थायी, नश्वर, नाशवान।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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