सं.स्त्री.
फा.
इज्जत, मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा।
- उदा.--आबरू थावतौ वठै, पीवणौ सही छौ आक, जीवणौ नहीं छौ, धणी जावतां 'जसूंत'।--दलजी महड़ू
(यौ.--आबरूदार) (वि.बेआबरू)।
- मुहावरा--1.आबरू उतरणी--अप्रतिष्ठा होनी.
- मुहावरा--2.आबरू उतारणी, अप्रतिष्ठा करनी, बेइज्जत कर देना.
- मुहावरा--3.आबरू खाक (धूल) में मिळणी--अपनी या दूसरे की इज्जत खराब होना.
- मुहावरा--4.आबरू मांथै पांणी फिरणौ--इज्जत खराब होना, प्रतिष्ठा में धक्का लगना.
- मुहावरा--5.आबरू मिट जाणी--इज्जत बरबाद हो जाना.
- मुहावरा--6.आबरू में फरक आणौ--इज्जत में धब्बा आना, प्रतिष्ठा में दाग लगना.
- मुहावरा--7.आबरू में बट्टौ लागणौ, लागबौ--प्रतिष्ठा में दाग लगना.
- मुहावरा--8.आबरू रै'णी--इज्जत रहना।
- कहावत--आबरू उड़ियोड़ी मोती वाळी आब है--इज्जत उतरणी एवं मोती का पानी उतरना एक ही बात है। कांतिहीन होने पर मोती किसी काम का नहीं, इसी प्रकार अप्रतिष्ठित मनुष्य का कहीं आदर नहीं होता। एक बार अप्रतिष्ठा होने पर वापस इज्जत जमानी बड़ी कठिन होती है।
क्रि.प्र.--उतरणौ-राखणौ-होणौ।