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उजागर  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
वि.
सं.उज्जार
1.प्रकाशित, जगमगाता हुआ।
  • उदा.--रूप के उजागर मनोज मन मोहियत--शि.वं.
2.प्रसिद्ध, विख्यात।
  • उदा.--थांन उजागर थापियौ, नाजर दौलतरांम।--रा.रू.
3.उज्जवल करने वाला, अपने नांम या वंश को प्रसिद्ध करने वाला।
  • उदा.--आयस पाय अवधपत आळौ, गौ लंका कपि वंस उजागर।--र.रू.
4.समर्थ, शक्तिशाली।
  • उदा.--कळजुग रै कीच कळै रथ कीरत, नारा दत बळ थाका नर। 'देसल' भूप दूसरा 'देसल', धमळ उजागर झाल धुर।--क.कु.बो.
  • उदा.--सांमां भूप गुणां बुधसागर, मौज उजागर मेर मन। अचरज क्यूं रहिया गुण एता, त्रण साढ़ा कर भूप तन।--क.कु.बो.
6.अद्‌भुत।
  • उदा.--एहवी उजागर पुरी एह, इक्ष्वाक वंस वाधै अछेह।--रांमरासौ
1.प्रकाश।
  • उदा.--मांणक कण हीर अमीर मोकळा। जरद नील मण जुवा जुवा। अवर न तूझ सरीखौ 'ऊदा', देस उजागर 'जगा' दुवा।--अज्ञात
2.सूर्य (नां.मा.)
वि.
उदार।
सं.पु.--


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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