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कुंभार     (स्त्रीलिंग--कुंभारण, कुंभारी)  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.कुंभकार
1.एक जाति विशेष जिसके व्यक्ति प्रायः मिट्टी के बर्तन आदि बनाते हैं। (स्त्री.कुंभारण, कुंभारी)
2.इस जाति का व्यक्ति, कुम्हार।
  • उदा.--खर पर लदै कुंभार, ऊंट भर भाड़े लावै।--दसदेव
  • कहावत--1.कुंभार कुंभारी सूं को नावड़ै (पड़पै) नी जरै गधेड़ा रा कांन मरोड़ै--बलवान से वश न चले तब निर्बल पर गुस्सा उतारने पर.
  • कहावत--2.कुंभार फूटा हांडां में हीज खावै है--बनाने वाला अपनी वस्तुओं का अधिक उपयोग नहीं करता। देखो कुंभार फूटी में रांधै'.
  • कहावत--3.कुंभार फूटी में रांधै--संपन्न व्यक्ति के घर में भी बेपरवाही अथवा अविचार से अशोभनीय कार्य हो जाते हैं.कुंभार रै घरे फूटी हांडी--देखो कहावत 2 और 3.
  • कहावत--5.निकमौ कुंभार घड़ै नै भांगै--निकम्मा आदमी बेकार के कार्य किया करता है; शून्य मस्तिष्क शैतान की उपज है।
पर्याय.--कुंभकार, कुलाळ, कूंभार, कोलाळी, घटकार, चक्कर-जीवत, परजापत।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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