सं.पु.
1.विवाहोपरांत पुत्री को वर के साथ विदा करते समय गाया जाने वाला लोक गीत.
2.गणगोर त्यौहार के अवसर पर गाया जाने वाला लोक गीत.
3.घोड़ा।
- उदा.--कुण थारा घुड़ला भंवरजी कस दिया जी, हांजी ढोला, कुण थांने कस दिया जीण।--लो.गी.
4.घड़े के आकार का छोटा पात्र जिसमें बहुत से छेद होते हैं और उसमें दीया जलता है। इसको लड़कियां सिर पर ले कर चैत्र मास में अपने मुहल्ले में घूमती हैं और इसी नाम का गीत गाती जाती हैं। वि.वि.--विक्रम संवत् 1558 चैत्र कृष्ण प्रतिपदा शुक्रवार तदनुसार तारीख 25 फरवरी 1492 मतान्तर से वि.सं.1558 (चैत्रादि 1559) चैत्र सुदि 3 (ई.स.1492 ता.
1.मार्च) को मारवाड़ राज्य के गांव कोसाना की बहुत सी हिन्दू कन्याएं तालाब पर गौरी पूजन करने को गई थीं। मौका पाकर अजमेर का सूबेदार मल्लू खाँ उनमें से 141 कन्याओं का अपहरण कर अपने साथ ले गया। जोधपुर के तत्कालीन नरेश राव सातलजी को जब यह संदेश प्राप्त हुआ तब उन्होंने त्वरित ही यवनों का पीछा किया। राव सातलजी उन 141 हिन्दू कन्याओं को यवनों के बन्धन से छुड़ा लाये और लौटते समय अपने साथ मल्लू खाँ की रूपवती पुत्री और 2 अमीरजादियों को भी पकड़ कर ले आये। इसके लिए राव सातलजी को सूबेदार के साथ भयंकर युद्ध करना पड़ा। इस युद्ध में सूबेदार मल्लू खाँ तथा उसका साथी घुड़ले खाँ, जो सिंध का एक अमीर था, रावजी के सेनापति सारंगदेवजी खीची के तीरों से छिद कर मारा गया। तीरों से छिदा घुड़ले खाँ का सिर उन 141 कन्याओं को सौंप दिया गया। वे उस सिर को लेकर सारे गांव में घूमीं। आज प्रायः समस्त राजस्थान में उसी दिन की यादगार में घुड़ले का मेला मनाया जाता है। हिन्दू कन्याएं अपने सिर पर अनेक छिद्रोंयुक्त छोटा घड़ा, जो भालों से छिदा घुड़ले खाँ के सिर का प्रतीक है, लेकर ग्राम में घूमती हैं। यह क्रिया पृथक्-पृथक् स्थानों पर कुछ निश्चित अवधि, प्रायः 3 से 7 दिन तक, होती है और अन्तिम दिवस सभी कन्याएं उन छिद्रयुक्त घड़ों को ग्राम के बाहर कुएं या तालाब में डाल कर प्रसन्नता मनाती हुई पुनः घर पर लौटती हैं।