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चीत  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
1.देखो 'चित्त' (रू.भे.)
  • उदा.--1..कसै चाप केमं, जती चीत पतंग विधि, हि सूं आसक होता।--र.रा.
2.चित्र, तस्वीर।
  • उदा.--उपजे कविता आपरी, इसी न उपजै ओर। भीत प्रमांणै चीत व्है, रीत 'प्रताप' निहोर।--जैतदांन बारहठ
3.चीता।
  • उदा.--नित ऊगां भूलै नहीं, सिंघा चीत सिकार। न्रिपति 'अभौ' तिम नागपुर, भूलै नहीं लिगार।--रा.रू.
4.स्मृति, याद।
  • उदा.--तरै अरड़कमल कह्यौ तिका वात हमार क्यूं चीत आई?--नैणसी
5.चिंता।--
  • उदा.--तण 'अजमाल' हूंत डरपंती, पतसाहां त्रिय चीत पड़ी। बुगचा आळमाळ कर बैठी, खड़े पाय हुय तड़ा खड़ी।--अभयसिंह रौ गीत
सं.पु.--
(सं.स्त्री.)


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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