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जस  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.यश
1.सुख्याति, कीर्ति, प्रशंसा, बड़ाई।
  • उदा.--पड़िया जुध प्रथमी जस पावै। कनिया हतण अजोग्य कहावै।--सू.प्र.
2.डिंगल का एक गीत (छंद) विशेष (क.कु.बो.) सर्व.--जिस।
  • उदा.--अमर वड तेतीस कोड जस नांम जपंदे।--केसोदास गाडण
  • उदा.--सँपजे जस जस सूर रौ, मह कुण दे तस मांण। जंग जीव कै झोकिया, भूपत हूवौ न भांण।--रेवतसिंह भाटी
पर्याय.--असतूत, असतूती, उदाहरण, कीरति, ख्यात, गुणावली, प्रिसिधि, प्रताप, प्रसध, वखांण, वरण, वययण, वाच, विरुद्ध, साधुवाद, सबद, समगिनां, सिलोक, सुजस, सुपारस, सुसबद, सोभाग।
वि.
जैसा।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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