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जां
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सर्व.
1.जिन।
उदा.--
दीनां आज तांई दांम जां का तौ दिरावौ, घोड़ा चायजै तौ करवांनां मा' लिरावौ।--शि.वं.
उदा.--
2..तोकतां बाग स्रवणां तणां, अग्र भाग दोनों अड़्या।
जां
पीठ जोध साबळ दुजड़, चाप बांण ले-ले चड़्या।--मे.म.
2.उन।
उदा.--
1..सुणतां ही सारौ साथ चढ़ियौ।
जां
दिनां रा खोखर सो कहणी में नहीं आवै।--सूरे खींवे री वात
उदा.--
2..खंड्या अनेक आक्रिति खळा, जोति हेक बप जूजवा।
जां
मध्य राज राजेस्वरी, हिंगळाज परगट हुवा।--मे.म.
3.जिस।
उदा.--
भावसिंघ सबळ का मांडण सवाई, औछाह सी लागै
जां
कू साह की लड़ाई।--रा.रू.
1.जब।
उदा.--
सज्जण अळगा तां लगइ,
जां
लग नयणे दिट्ठ। जब नयणां हूं बीछुड़े, तब उर मंझ पइट्ठ।--ढो.मा.
2.जबतक।
उदा.--
रोहे 'पातल' रांण,
जां
तसलीम न आदरै। हिंदू, मूस्सलमांण, एक नहीं तां दोय है।--सूरायच टापर्यौ
3.जहां।
उदा.--
1..जोवै
जां
ग्रिह-ग्रिह जगन जागवै, जगनि-जगनि कीजै तप जाप। मारगि-मारगि अंब मौरिया, अंबि-अंबि कोकिल आलाप।--वेलि.
उदा.--
2..उत्तर आज स उत्तरउ, सही पड़ेसी सीह। वालंभ धरि किम छांडियइ,
जां
नित चंगा दीह।--ढो.मा.
क्रि.वि.(सं.यावत्)
वि.
जितना।
नोट:
पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।
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