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जास  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
क्रि.वि.
जिससे।
  • उदा.--अजंपा जाप री अविल आस, जाड भ्रम अविद्या टळै जास।--पी.ग्रं.
1.जिस।
  • उदा.--मांण दुजोयण मालदे, जिण वाधौ जगहत्थ। भारत भिड़िया जास भड़, साह हूंत्त समरत्थ।--बां.दा.
2.जिन।
  • उदा.--कवण देस तइं आविया, किहां तुम्हारउ वास। कुण ढोलउ कुण मारुवी, राति मल्हाया जास।--ढो.मा.
1.एक प्रकार का पिशाच (जैन)
2.समूह।
  • उदा.--दास दास लीला विलास, निगुण ग्रभवास निवारण। ग्रब प्रास निसचरां नास इळा अध जास उतारण।--पी.ग्रं.
3.देखो 'ज्यास' (रू.भे.)
सर्व.--
सं.पु.(सं.जाष)


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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