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जै
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
1.बृहस्पति.
2.पुष्य नक्षत्र.
3.सूर्य.
4.ब्रह्मा.
5.पतंगा.
6.अग्नि (एका.)
7.देखो 'जय' (रू.भे.)
उदा.--
प्रबळ सुर असुर जिण लगाया पागड़ै, जिकौ खळ चापड़े खेत जारां। पाड़ियौ रांम दसकंठ पीठांण में, सबद
जै जै
हुवा लोक सारां।--र.रू.
मुहावरा--
जै मनाणी--मंगल कामना करना, विजय की कामना करना, समृद्धि चाहना.
मुहावरा--
2.जै हौ--पूज्य और ब्राह्मणों द्वारा आशीर्वाद के उपलक्ष्य में कहा जाने वाला शब्द।
8.देखो 'जे' (रू.भे.)
उदा.--
1..
जै
डर न होइ जांणां जनक प्रणत काल्हि लागूं पगां। सो जै न होइ दीजै सहज सुत अपजस असंगां सगां।--वं.भा.
उदा.--
2..कंवरी सूरज कंवर, 'अजन' ध्रम रचे अपंपर।
जै
नांनौ 'अमरेस', धरा जेसांण छतरधर।--रा.रू.
उदा.--
3..साधां गिरि राया
जै
महमाया, सातां दीपां मां छाया।--पी.ग्रं.
उदा.--
4..जाइऔ सरब संसार
जै
विसर कहीजै सीलवंत। जम तणौ अंत कंत जयांनखी अनंत नमौ फेरा अनंत।--पी.ग्रं.
उदा.--
5..
जै
जीतौ अजमेर घड़ी मांही घण चक्कह। जै लीयौ जाळोर भिड़ै पट्ठांण कटक्कह।--गु.रू.बं.
नोट:
पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।
राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास
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