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त्रिभुवन  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.
तीनों लोक--स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल।
  • उदा.--1..देवी गाजता दैत ता वंस गमिया। देवी नवे खंड त्रिभुवन तूझ नमिया।--देवि.
  • उदा.--2..आयौ अस खेड़ि अरि सेन अतरै, प्रथिमी गति आकास पथ। त्रिभुवननाथ तणौ वेळा तिणि, रव सभळी कि दीठ रथ।--वेलि.
रू.भे.
तिभवण, त्रभवण, त्रभवन, त्रभुयण, त्रिभवणा, त्रिभुअण, त्रिभुवण, त्रिभुवन्न, त्रिभोयण, त्रिभोवण, त्रेभवण, त्रंभुयण, त्रंभुवण, त्रेभायण।
यौ.
त्रिभुवणभूप, विभु-वनधणी, त्रिभुवननाथ, त्रिभुवनपति, त्रिभुवनराय, त्रिभुवनसुंदरी, त्रिभुवनस्वांमी।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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