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थुइ, थुई  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.स्त्री.
1.ऊँट के पीठ की कूबड़, ऊँट के पीठ का उभरा हुआ भाग,
2.पुष्टता,
3.आगे निकला हुआ पेट, तोंद।
  • मुहावरा--थुई चढ़णी--चरबी बढ़ना, पेट का फूलना, तोंद निकलना, पुष्ट होना।
4.स्तुति, प्रशंसा।
  • उदा.--1..जिणि दिन पांचमि तप करइ तिणि दिन आरंभ टाळइ रे। पांचमि तवन थुइ कहइ, ब्रह्म चरिज पणि पाळइ रे।--स.कु.
  • उदा.--2..इय जिण वल्लह-थुइ भणिय, सुणियइ करइ कल्लांणु। देउ बोहि चउवीस जिण, सासइ सखनिहांणु।--षष्टिशतक प्रकरण
  • उदा.--3..थियौ सदय सुण निज थुई, टीटभ हूँत क्रसांन। उण रा बाळ उबारिया, महामंत्र जस मांन।--बां.दा.
रू.भे.
थूई, थूही
(सं.स्तु)


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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