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धारणा  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.स्त्री.
सं.
1.मन में धारण करने या समझने की वृत्ति, किसी बात को मन में धारण करने की शक्ति, अक्ल, बुद्धि, समझ,
2.पक्का विचार, दृढ़ निश्चय।
  • उदा.--सो म्होकमसिंघ इसी मोटी बातां नूं बाथ मारै। नित धारणा आहीज धारै।--प्रतापसिंघ म्होकमसिंघ री वात
3.ध्यान में या मन में रखने की वृत्ति, स्मृति, याद।
  • उदा.--चौसट अवधांन तणी चतुराई, बोलण महाराजां बिरद। खूबी मिळी धारणा ख्यातां, जगदंबा तो क्रपा जद।--बां.दा.
4.धारण करने की क्रिया या भाव.
5.मन की वह स्थिति जिसमें कोई और भाव या विचार नहीं रह जाता, केवल ब्रह्म का ही ध्यान रहता है। यह योग के आठ अंगों में से छठा अंग माना जाता है।
  • उदा.--भेद विवेक विचार धारणा, सुध बुध सरधा सागी। स्रवण मनन निध्यासन करके, ब्रह्म लख्यौ बडभागी।--स्री सुखरांमजी महाराज
6.मुख की वह स्थिति जिससे हर्ष, शोक आदि का पता चले, भाव प्रकट करने की मुखाक्रति।
  • उदा.--ज्यौं ज्यौं व्राहमण नजीक आवै छै त्यों त्यौं रुखमणीजी ब्राहमण की मुख की धारणा ताकै छै। यौं ले आयौ होसी तौ मुख की धारणा रूड़ी होसी।--वेलि.
7.कभी विस्मृत न होने वाला निश्चयात्मक ज्ञान (जैन)


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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