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धड़क  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.स्त्री.
अनु.
1.भय, डर, आशंका।
  • उदा.--रण झणण नाद खुरसांण खागां रड़क, वाज खण खणण कड़ियाळ बंदी बड़क। धरपती जठी रै तठी मांनै धड़क, कठी रै मारवा--राव वाळी कड़क।--महादांन महडू
2.दिल के कूदने या उछलने की क्रिया, हृदय का स्पंदन.
3.अंदेशा, दहशत, भय या आशंका के कारण दिल का जल्दी--जल्दी और जोर से कूदना, हृदय का अधिक स्पंदन, जी धक धक करने की क्रिया।
  • उदा.--1..पग पाछा छाती धड़क, काळौ पीळौ दीह। नैण मिंचै सांम्हौ सुणै, कवण हकाळै सीह।--वी.स.
  • उदा.--2..फाड़ नै खाय जाऊं साळा नै समझ्‌या कै नी? जबाब में ऊंठां पर बैठ्‌योड़ां रा फगत काळजा धड़कता--धड़क ! धड़क ! धड़क !--रातवासौ
4.दिल के कूदने की आवाज, हृदय के स्पंदन का शब्द।
रू.भे.
धड़क्क, धडक।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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