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निंदा  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.स्त्री.
सं.
1.ऐसी बात कहना जिससे किसी व्यक्ति, वस्तु आदि के दुर्गुण, तुच्छता, दोष आदि प्रकट हों, दोष-कथन, बुराई का वर्णन, अपवाद, जुगुप्सा, बदगाई, कुत्सा (डिं.को.)
  • उदा.--1..ऊपाड़ै आबू जिती, पर निंदा री पोट। पिसण न्याय पग डग पड़ै, दुरासीस लग दोट।--बां.दा.
  • उदा.--2..भाव बतायौ वस्त रौ रे, और सुणाई बात। वंदन कर निंदा करै, ज्यांरै पड़ी अंधारी रात।--श्री हरिरांमजी महाराज
  • उदा.--3..दादू जिहिं घर निंदा साधु की, सो घर गये समूळ। तिनकी नींव न पाइयै, नांव न ठांव न मूळ।--दादूबांणी
2.अपकीर्त्ति, कुख्याति, बदनामी।
  • उदा.--हरख सोच नहिं हियै, सुजसा निंदा नहिं सारै। जीवण मरण जिहांन, लग्यौ है प्रांणी लारै।--ऊ.का.
3.देखो 'निद्रा' (रू.भे.)
रू.भे.
नंदा, निंद, निंदरा, निंदिया, निंद्या, निंद्रा।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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