सं.स्त्री.
सं.
1.ऐसी बात कहना जिससे किसी व्यक्ति, वस्तु आदि के दुर्गुण, तुच्छता, दोष आदि प्रकट हों, दोष-कथन, बुराई का वर्णन, अपवाद, जुगुप्सा, बदगाई, कुत्सा (डिं.को.)
- उदा.--1..ऊपाड़ै आबू जिती, पर निंदा री पोट। पिसण न्याय पग डग पड़ै, दुरासीस लग दोट।--बां.दा.
- उदा.--2..भाव बतायौ वस्त रौ रे, और सुणाई बात। वंदन कर निंदा करै, ज्यांरै पड़ी अंधारी रात।--श्री हरिरांमजी महाराज
- उदा.--3..दादू जिहिं घर निंदा साधु की, सो घर गये समूळ। तिनकी नींव न पाइयै, नांव न ठांव न मूळ।--दादूबांणी
2.अपकीर्त्ति, कुख्याति, बदनामी।
- उदा.--हरख सोच नहिं हियै, सुजसा निंदा नहिं सारै। जीवण मरण जिहांन, लग्यौ है प्रांणी लारै।--ऊ.का.
रू.भे.
नंदा, निंद, निंदरा, निंदिया, निंद्या, निंद्रा।