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निगम  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.
1.ईश्वर, परमात्मा (ना.मा.)
  • उदा.--निराकार निरलेप निगम निरदोस निरंजन, दीरघ दीनदयाळ देव दुख दाळद भंजन।--ऊ.का.
2.वेद (डिं.को.)
  • उदा.--1..सो भज 'किसन' रांम सीतावर, संत तार ब्रद निगम सखै।--र.ज.प्र.
  • उदा.--2..दुस्टी असन्नू वेद छिन्नू बहु रुदन्नू अज्जा ए। हा हा! विसन्नू हूय प्रसन्नू, धारि तन्नू कज्जा ए। मच्छा हयग्रीबूं भक्ति सीवूं निगम कीवूं ठांम ए, ऐसा गोविंदु क्रपासिंधु दीनबंधु रांम ए जीं दीनबंधू रांम ए।--करुणासागर
3.शहर, नगर (अ.मा.)
4.मार्ग, रास्ता (ह.ना.)
  • उदा.--परणीजै मधुपुरी, 'अभौ' व्रंदावन आयौ। पेखि धांम सुख परम, भड़ां तीरथ मन भायौ । परखि निगम दु्रम पुंज, हेक सुख कुंज निहारै । हेक पुलिण हित करै, हेक जळ जमण विहारै।--रा.रू.
5.समूह, झुण्ड।
  • उदा.--फूलत कंवळ कमोदणी, रवि ससि को डर मांहि। आस पास मधुकर निगम, रहै तहां मंडराइ।--गजउद्धार
6.शास्त्र।
  • उदा.--दादू निरंतर पिव पाइया, जहं निगम न पहुंचे वेद। तेज स्वरूपी पिव बसे, कोई विरळा जांणै भेद।--दादूबांणी वि.
  • उदा.--निगम भोम गुरुदेव की, ज्यां हंस पठाया हो। हरिरांम उण देस कूं, अनुभव ले गाया हो।--स्री हरिरांमजी महाराज
रू.भे.
निगम्म, निगेम, निगम, नीगम।
(सं.) जहां न पहुंच सके, अगम्य।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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