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शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.
1.दूर करने, हटाने या मिटाने की क्रिया।
उदा.--
1..सीत
निवारण
जीरण कंथा, ताकै थेगल लागी। गिर तरु मंडी मसांण चोड़ै, ऐसै रह अनुरागी।--स्री सुखरामंजी महाराज
उदा.--
2..राह भवन धन धन सुख राखै, दुनी कुबेर सरोतर दाखै। केत अस्टमै थांन सकारण, नितप्रत ततपर कस्ट
निवारण
।--रा.रू.
उदा.--
3..परम्म निवास
निवारण
पाप, जोगेसर भद्र अजप्पा जाय। दातार-मुकत्ति दिनंकर देव, सारूप सालोक सांमीप सांमेव।--ह.र.
2.रोकने या बंद करने की क्रिया।
उदा.--
त्री वदन पीतता चित व्याकुळता, हियै ध्रगध्रगी खेद हुह। धरि चख लाज पगे नेउर धुनि, करे
निवारण
कंठ कुह वेलि।--वेलि.
3.छुटकारा, निवृत्ति।
रू.भे.
नवारण, निवारन।
नोट:
पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।
राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास
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