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नेह
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
देखो 'सनेह' (रू.भे.)
उदा.--
1..वार-वधू ही हरण वित,
नेह
जाणावै नैण। यूं सिर लेवा ऊचरै, वैरी मीठा वैण ।--बां.दा.
उदा.--
2..मन मांणक गहणौ धर्यौ, मिंत तुमारे पास।
नेह
व्याज अति वाढ्यौ, नहिं छूटण की आस।--अज्ञात
उदा.--
3..बळ
नेह
दिवलौ बळे, औ भरियौ अपकार। राख नेह बळतां रथी, विधु बदनी बळिहार।--रेवतसिंह भाटी
उदा.--
4..आंत ओज भेळी असत, नैण नळी भख नेह। आमिख नर नांखै उदर, आंणे हरख अछेह।--बां.दा.
नोट:
पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।
राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास
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