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पंचरतन, पंचरत्न  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.
1.पाँच प्रकार के रत्न यथा--माणिक्य, पन्ना (मरकत), पुष्पराज, हीरा व नीलम। मतान्तर--सोना, चाँदी, मोती, लाजावर्त व मूंगा। मतान्तर--सुवर्ण, हीरा, नीलम, पद्मराग व मोती। मतान्तर--नीलम, हीरा, पद्मराग, मोती व मूंगा।
2.श्रीअच्युत विरचित एक स्तोत्र का नाम।
3.अनुस्मृति, गजेन्द्रमोक्ष, गीता, भीष्मस्तव और विष्णुसहस्रनाम--इन पांच ग्रंथों के संग्रह का नाम।
  • उदा.--पर निंदा आठूं पहर, चाटै विख री चाठ। क्यों नंह तू प्रांणी करै, पंचरतन रौ पाठ।--बां.दा.


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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