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पगार
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.पुराकार
1.परकोटा, शहरपनाह।
उदा.--
1..स्त्री नगर जाळहुर तणी रचना। गढ़-मढ़ मंदिर पोळ-
पगार
। अट्टाळीयां माळीयां टोडड़े त्रिकळसां गगन चुंबित कोसीसां।--कां.दे.प्र.
उदा.--
2..गढ़-मढ़ मंदिर नव-नवां, नव-नव पोळि-
पगार
। सुर-मंदिर सरवर नवां, नव-नव न्रपति विचार।--मा.कां.प्र.
2.मार्ग, रास्ता।
उदा.--
धांम-धांम मंगळ-धवळ, हूए हंगांम हलोर। छड़क
पगारा
नीर छित, घुरै नगारां घोर।--र.रू.
3.पराक्रम, शौर्य, बाहुबल।
उदा.--
'माधव' वद्दि सात्रवां मार। 'पूरणमलोत' बांहां
पगार
।--गु.रू.बं.
4.वह जलाशय, बाँध, सागर या नदी जो पैरों से चल कर पार किया जा सके।
उदा.--
स्री माहाराज ईस्वरा अवतार, कळिजुग समुद्र जाकै आगै
पगार
।--रा.रू.
5.गढ़, किला।
उदा.--
लोह
पगार
कहै लाखावत, गैमर हैमर जेथ गुड़ै। मुंह रावत जो आप न मुड़िये, मौड़ा वेघा प्रसण मुड़ै।--रावत चूंडा सीसोदिया रौ गीत
6.रक्षा, पनाह।
उदा.--
प्रजा प्रकार द्वार पै,
पगार
पावती नहीं।--ऊ.का.
7.तनख्वाह, वेतन।
उदा.--
म्हैं आप नै म्हारा राज रा खास दीवांण वणावणा चावूं।
पगार
आप फरमावौ जकौ म्हनै मंजूर है।--फुलवाड़ी
1.रक्षा करने वाला, रक्षक।
उदा.--
तठा उपरांति करिनै राजांन सिलांमति उआं गज राजां आगै गड़ा, चरखी दारू रा आरावा छूटिनै रहिया छै। जांणै धुंधळै पहाड़ पाखती रीछी लाग रही छै। मदि वहतां मतवाळा ज्यौं पग नीठ भरै छै। गडां रा तोड़णहार दरवाजां रा फोड़णहार दळां रा मोड़णहार, दलां रा
पगारा
फौजां रा सिणगार।--रा.सा.सं.
रू.भे.
पगार।
[देशज]
वि.--
नोट:
पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।
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