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परलोक
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.
1.शरीर छोड़ने पर आत्मा को मिलने वाला लोक, वैकुण्ठ।
उदा.--
'जसवंत' जुवति जे जहंहि जीव, दहनोदय दहंही प्रथख पीब। निस्चिंत पतिव्रत लोक नेम, प्रत्येक करहिं
परलोक
प्रेम।--ऊ.का.
2.दूसरा लोक।
यौ.
परलोकगमन, परलोकप्राप्ति, परलोकवास।
मुहावरा--
1.परलोकगांमी होणौ--मरना।
मुहावरा--
2.परलोक सिधारणा--मरना।
रू.भे.
परलोय, प्रलोक।
नोट:
पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।
राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास
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