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परिघ, परिघन  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.पुरिघः
1.एक आयुध विशेष।
  • उदा.--केते कुठार बाहत करूर, परिघन कितेक कितेक सिर चकनचूर।--ला.रा.
2.ज्योतिष के 27 योगों में से 19 वाँ योग। वि.वि.--इस योग को आधा छोड़ कर शुभ कार्य करना चाहिए।
रू.भे.
परघ्घन, परिघ्घन।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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