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पाप  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.
1.वह कार्य जिसका फल इस लोक व परलोक में अशुभ हो, निंदित काम।
  • उदा.--धोळा बुगला ध्यांन लगावै, खावै मछियां खूब। पापी पल पाप कमावै, डबके जावै डूब।--ऊ.का.
  • उदा.--पाप जिता तू पलक में, सुरसरी हरण समत्थ। इता पाप ऊमर महीं, सौ कुण करण समत्थ।--बां.दा.
  • मुहावरा--1.पाप उदय होणौ--संचित पाप का फल मिलना, बुरे दिन आना।
  • मुहावरा--2.पाप कटणौ--पाप का नाश होना, अच्छा समय आना।
  • मुहावरा--3.पाप काटणौ--पाप से मुक्त करना, नष्ट करना।
  • मुहावरा--4.पाप कमाणौ--पाप कर्म करना, झूठ कपट छल आदि को अपने जीवन में स्थान देना।
  • मुहावरा--5.पाप प्रगटणौ--देखो 'पाप उदय होणौ'।
  • मुहावरा--6.पाप रौ धूप--क्षणिक, अस्थायी।
  • मुहावरा--7.पाप लागणौ--अपराध होना, बुरे कर्म का बुरा परिणाम भोगना, कलंक लगना।
3.दुर्भाग्य।
  • उदा.--रोग सोक दुख पाप रिण, मत करौ प्रवेस। रहौ अनीत अनीत विण, दाता हंदै देस।--बां.दा.
4.वध, हत्या।
5.बुरी नीयत, खोट, हीनभावना।
  • उदा.--हरसा समरथ मोबी रे, जे तूं राखैला पेटै पाप। ओदर का रे लोट्‌या, दरगा में दांवणगिरियां रै बणूं।--लो.गी.
6.अनिष्ट, अहित, बुराई।
7.झंझट, जंजाल।
  • मुहावरा--1.पाप कटणौ--झगड़ा दूर होना।
  • मुहावरा--2.पाप काटणौ--झगड़ा मेटना।
  • मुहावरा--3.पाप मोल लेणौ--झंझट में पड़ना, बखेड़े में पड़ना।
  • मुहावरा--4.पाप पलै पड़णौ--व्यर्थ का झंझट शिर पड़ना।
  • मुहावरा--5.पाप मिटणौ--झंझट हटना।
6.पांच मात्रा के आठ भेदों में से पांच लघु मात्रा का नाम। (र.ज.प्र.)
7.दुःखद वर्णन* (डिं.को.)
8.अटल* (डिं.को.)
9.तप्त वर्णन* (डिं.को.)
10.कृष्ण वर्णन* (डिं.को.)
रू.भे.
पापि, पापु, पाव।
अल्पा.
पापौ।
दुष्कर्म।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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