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प्रसस्त  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
वि.
सं.पुरशस्त
1.प्रशंसनीय।
  • उदा.--सुख दुख राजी सदा, वसंत वनड़ौ वण जावै। हरियै वागै हरख, महक मीठी फैलावै। उपकारी प्रसस्त, गिणै ना सीत सियाळै। लुवां ताती रेत, उनाळै भांण उकाळै।--दसदेव
2.प्रशंसा किया हुआ।
3.सर्वोत्तम, श्रेष्ठ।
रू.भे.
पसत्थ।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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