HyperLink
वांछित शब्द लिख कर सर्च बटन क्लिक करें
 

प्रांणी  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
वि.
सं.प्राणिन्‌
पांचों प्राणों को धारण करने वाला, जिसमें पांचों प्राणों का निवास हो, जीवधारी, प्राण-धारी।
  • उदा.--1..जग में बांछै जीवणौ, सब प्रांणी समुदाय। हटकर नर उण नूं हरे, जुलम कह्यौ नहि जाय।--बां.दा.
  • उदा.--2..भैंस्यां रिड़कै रिड़ गायां रंभावै। प्रांणी तिरसातुर पांणी कुण पावै।--ऊ.का.
1.मनुष्य।
2.व्यक्ति।
3.पुरुष की दृष्टि से उसकी स्त्री और स्त्री की दृष्टि से उसका पति।
रू.भे.
परांणी, पिरांणी, प्रांणि, प्रांनी।
अल्पा.
प्रांणिय, प्रांणियउ, प्रांणियौ, प्रांणीड़ौ।
सं.पु.--


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

Project | About Us | Contact Us | Feedback | Donate | संक्षेपाक्षर सूची