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बाखड़ी  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.स्त्री.
सं.बष्कयणी, बष्कयिणी, बष्कयनी, बष्कयिनी
बह गाय या भैंस जिसको प्रसव किये बहुत समय हो चुका हो और दूध देती हो।
  • उदा.--बैठी बाखड़ियां चाखड़ियां चाटै, कांमळ नै चकियां चकियां सूं काटै। माकड़ माकड़सी मोळी मुख मोळै, घरणी हिरणी लख हिरणी चख घोळै।--ऊ.का.
  • उदा.--2. भैंसड़ियां दस वीस सुवाड़ी बाखड़ी, चर चर लीला घास वाड़ा में रहै खड़ी। चोखा चावळ आंण सकर में ओलणां, इतरा दै करतार फेर नहिं बोलणा।--अज्ञात
रू.भे.
बाड़ी, बाखडी, बाखरी। मह.--बाखड़।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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