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बावड़ी  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.स्त्री.
सं.वापि, वापी
1.चारों ओर से खुला हुआ चौड़े मुंह का एक प्रकार का कुआ जिसमें नीचे तक पहुंचने के लिये एक तरफ सीढ़ियां बनी होती है, बाउली।
  • उदा.--1..पाहण गळ बांधै पड़ौ, बेरां बावड़ियाह। पिण मंगण मत पारथौ, मुजळां मावड़ियांह।--बां.दा.
  • उदा.--2..सोझत था कोस
3.खरककूण मांहै। सीरवी बांझण बांणीया रजपूत बसै। बावड़ी
2.बी.वीदा री कराई छै। ऊनाळी अरट 45 तथा 50 गेंहू बण केढ़ोतरा हुवै, बरसाळी खेत सखरा खेत
5.तथा
10.चींणा रा। तळाव एक चेहनडी गांव नजीक छै।--नैणसी
2.बांसुरी में फूंक देने का नीचे का स्थान जहां खड्डा होता है।
रू.भे.
बाउड़ी, बाबड़ी, वावड़ी, वावळि, वावळी।
अल्पा.
बावड़ली। मह.--बाव, वाव।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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