वि.
सं.
1.बाहर का, बाहर सम्बन्धी।ै
4.भीतर या अन्दर का विपर्याय।
- उदा.--नवमी भावना एम भावउ, निरजरा तप बा'र रै। छव छइ बाह्य छब छइ अभ्यंतर, पहुंचावइ भव पार रै।--स.कु.
5.राजा की सवारी का हाथी। (डिं.को.)
रू.भे.
बाहियउ,
बाह्यांतर--क्रि.वि.(सं.) भीतर--बाहर दोनों ओर।
- उदा.--रचै तूं ढाहै तूं नियम जुत चाहै फिर रचै। नचावै जीवों को निडर निज बाह्यांतर पचै।--ऊ.का.