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बैस  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
1.एक प्राचीन क्षत्रिय राजवंश।
  • उदा.--कोच पुंडीर बैस मकवांणां, चाढ़ै धकै तुंवर चहुवांणां। धड़छे ऊमरखांन खग धारै, साठ हजार पठाण संघारे।--सू.प्र.
2.देखो 'वेस्य' (रू.भे.)
  • उदा.--नहीं तूं बिप्र नहीं तूं बैस, नहीं नूं खत्रिय सूद न खैस। नहीं तूं मूळ नही तूं डाळ, नहीं तूं पत्र नहीं जु पराळ।--ह.र.
3.देखो 'वयस' (रू.भे.)
  • उदा.--चढ़ती बैस नैण असियाळै, तूं घरि घरि मत डोल। मीरां के प्रभु हरि अबिनासी, चेरी भई बिन मोल।--मीरां
4.देखो 'वेस' (रू.भे.)
5.देखो 'बहस' (रू.भे.)
विशेष विवरण:-बैस सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं। उत्तर--प्रदेश में ये अधिक हैं और वहां इनके नाम से 'बैसवाड़ा' एक इलाका प्रसिद्ध है।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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