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बोक  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
वि.
1.मूर्ख, अज्ञानी, अनजान।
  • उदा.--जांणै जिके सुजाण नर, नहिं जांणे सौ बौक। जमी और असमांन बिच, आबू तीजौ लोक।--डाढाळा सूर री बात
1.बकरा।
  • उदा.--वाड़ौ भर्‌यौ है छाळयां--बाकर्‌यां जे, जे मैं म्हारौ दाड़ीवाळो बोक। ओ क वरसै वरसोदण होळी पांवणी जे।--लो.गी.
2.छेद, सुराख। ज्यूं--गांठ सावळ बांधजै, बठैई बोक नई रै जाय। (सं.बुक्कस्‌)
3.चंडाळ, श्वचप। (सं.बुक्क)
4.रोने या चिल्लाने की आवाज या ध्वनि।
5.किसी द्रव पदार्थ का तेज प्रवाह।
6.मूर्खता, अज्ञानता।
  • उदा.--रांवण रै कब्जै रही, सीहता रौ किम रहियौ सील कि। लोक बौक के लागुआ, ए परपूठ करै अवहील कि।--ध.व.ग्रं.
6.देखो 'बूक' (रू.भे.)
  • उदा.--तरै भींवै माथौ ऊंचौ कीयी। तरै योगीसर रिणोई मांहै होयनै कनै आया। तरै भींवै बोक मांडि दिखाई। जोगीसरां कनै तूंबी मांहै पांणी थौ, तिको पायो नै अमल खबायौ।--जखड़ा मुखड़ा भाटी री बात
सं.पु.(सं.बुक्क: प्रा.बोक्कड)


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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