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भोग  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.भोग:
1.भोगने की क्रिया या भाव।
2.इच्छा-पूर्ति या प्रसन्नता की दृष्टि से अभीष्ट या सुखद वस्तु को अपने मनमाने ढंग से उपयोग में लाने की क्रिया या भाव।
  • उदा.--करि सनांन ध्रम करै, धरै प्रम ध्यांन स्यांमध्रम। काया जोग अनेक, भोग माया तजि विभ्रम।--सू.प्र.
3.उपयोग।
  • उदा.--जै थां लोगां नै सुखी होवण री थोड़ो घणी चावना है तौ आज सूं इण बात रौ प्रण करलौ कै हाथां कमायां बिना थें किणी चीज रौ भोग नीं करौला।--फुलवाड़ी
4.देवी देवताओं के उपभोगार्थ मूर्ति के सामने रखा जाने वाला भोज्य पदार्थ, नैवेद्य।
  • उदा.--1..धूप दीप नैवेद्य आरती, सब ही सौंज लै आ री। बहु विध सूं पकवांन बणाकर, करौ भोग की त्यारी।--मीरां
  • उदा.--2..है! उठौ सासूजी रांधौ लापसी, है देवता रै भोग लगाड़। उठौ बाइसा बांधौ राखड़ी, थारां वीराधैसा जतन कराव।--लो.गी.
5.भोजन करने या खाने की क्रिया या भाव। क्रि.प्र.--लागणौ।
6.भोज्य पदार्थ, खाना, भोजन।
  • उदा.--1..अन धन जिण धर आसरौ, भला अरोगे भोग। पइसौ हुवै न पास में, लूलू करदै लोग।--ऊ.का.
  • उदा.--2..क्यूं कांम कमावै तन मन तावै, खावै भोग खटंदा है। बिदवाहां बासै सोगन सांसै, कांसै रोग कटंदा है।--ऊ.का.
7.वह अवस्था जिसमें किसी भूमि या संपत्ति को अपने अधिकार में रखकर उससे पूर्ण लाभ उठाया जाता है।
8.कब्जा, भुक्ति।
9.आराम, चैन, ऐश।
10.संभोग, मैथुन।
  • उदा.--संझ्या समै रावजी महिलां पधारीया तरै अपछरा मुजरौ करै नै सीख मांगी। अबै तौ साहिबजी मोनै लोकां दीठी। राज पीण हकीगत कीही सो म्है तौ जावसूं। रंग भोम विलास करनै अलोप हुई।--वीरमदे सोनगरा री बात
11.संभोग शक्ति।
  • उदा.--भोग बधावण भखौ, भोग फिर दूर भमैला, रोग मिटवण रखौ, जनम रौ रोग जमैला। सोग हटावण सधौ, सोग में पड़िया सिड़स्यौ, लोक रीत सूं लधौ, लोक सूं चिड़स्यौ लड़स्यौ। ओखदि पिछांण खावौ अमल, ओखदि है नह अकल रौ, असल रौ मजौ क्यूं और है, निकमूं आनंद नकल रौ।--ऊ.का.
121.घर, मकान।
13.निवासस्थान।
  • उदा.--गढ़ चितौड़ नां रहां, नहीं रहण का जोग। बसरूस्यां रूडी द्वारिका, जां हरि भगतां का भोग।--मीरां
14.सुख।
  • उदा.--सता समाध अगम घर सोऊं, दस दिस रांम रमैयौ दोऊं। जगत भोग सपनां सम जोऊं, हमहीं गाय सिंध मैं होऊं।--ऊ.का.
15.दुख, कष्ट।
13.पाप या पुण्य का वह फल जो सहन किया जाता है।
17.किसी काम से बात से प्राप्त होने वाला फल।
18.किराया, भाड़ा।
19.राज्य कर।
  • उदा.--1..पत्र जेण लिखौ इण विध प्रियोग, भेजौ सताब खुरसांण भोग। मो पाटि बइट्ठां पछौ माल, उपजेस सकळ भेजौ अपाल।--सू.प्र.
  • उदा.--2..आवै दाव कळहण दुनियांन सौह ऊचरै, बडी धर राव रूकां विभाड़ी। उधारी राड़ि रजपूत आंबेरि धरि, 'पहाड़ी' 'कांमां' ले भोग पाड़ी।--फतैसिंघ नरूका रौ गीत
20.जागीरदार द्वारा कर-स्वरूप लिया जाने वाला कृषि की उपज का कुछ निश्चित अंश या हिस्सा, हासिल।
  • उदा.--1..उदैपुर री हवेली रा गांव नजीक तिण रौ हैंसो भोग रौ वरसाळी हैंसो लाग सूधौ आध उनाळी हैंसो आध पड़ै।--नैणसी
  • उदा.--2..सवळो भरीजै तद हासल इजाफा हुवै। काठा गोहूं मण 15000 बीज बावै तिकै साठां नीपजै। बीज बावै तितरौ भोग आवै।े बीजी लागत घणी छै।--नैणसी
21.ज्योतिष में, सूर्य आदि ग्रहों का मीन, मेष आदि राशियों में अवस्थित रहने का काल या समय।
22.सांप का फन।
  • उदा.--1..बंबी अंदर पोढियौ, काळौ दबकै काय। पूंगी ऊपर पाधरौ, आवै भोग उठाय।--वी.स.
  • उदा.--2..दूजा गज रौ पोगर अरिसिंध री पाध ऊपर आयौ जांणै पूंग्यां रा पूंज पर नागराज भोग उठायौ।--वं.भा.
23.सांप।
24.आय, आमदनी।
  • उदा.--धरती मांहै थांणा ठोड़-ठोड़ राखिया छै, पण धरती भोग पड़ सकै नहीं।--नैणसी
25.बलि।
26.दावत, प्रीतिभोज।
27.लाभ, फायदा।
28.धन, सम्पत्ति।
29.वैश्या के साथ संभोग करने पर उसको दिया जाने वाला धन।
30.शरीर, देह।
31.परिणाम, मान।
32.प्रारब्ध, भाग्य।
33.छप्पन की संख्या। *
34.शासन, हुकूमत।
35.मालगुजारी।
36.देखो 'संभोग' (रू.भे.)
रू.भे.
भोग, भौग।
क्रि.प्र.--लगाणौ, मेलणौ।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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