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मस्तक  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
पु.
सं.
1.सिर, माथा, मुण्ड। (ह.नां.मा.) (उ.र.)
  • उदा.--1..जननी तूझ हस्त मस्तक जिहं। त्रिदक्षालय सुख वसत निलय तिहं।--मे.म.
  • उदा.--2..भारथ बरंग हुवौ धण भिड़तां, सत्र साझंतां बाहतां सार। हर महरांण तणौ मस्तक हद, जड़िया गति मेळै जटधार।--जोगीरांम हाडा रौ गीत
  • उदा.--3..धरणीधर संकर देव धियावउ, जोति प्रकास अलोप जग। मस्तक मुगट प्रकास मांकडउ, अनंत कोट व्रहमंड लग।--महादेव पारवती री वेलि
2.भाग्य, तकदीर।
  • उदा.--सो बैरी कटवण मिळै, मस्तक लिख्या सो होय। लेख लिख्या कू बाळका, मेट न सक्कै कोय।--अज्ञात
3.शिखर, चोटी।
रू.भे.
मसतक, मसतक्क, मसतग, मस्तकु, मस्तक्क, मस्तग, मस्तगि, मस्तगी, मस्तिकि।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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