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महंत  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.
1.किसी संप्रदाय या मठ का अधिष्ठाता, आचार्य, प्रधान साधु।
  • उदा.--1..एकै जय जीह लहै कुण अंत, पारौ नंहं प्रांभै सेस पुणंत। मुनेसर ध्यांन धरंत महंत, अखै जुग हेकौ ही नांम अनंत।--ह.र.
  • उदा.--2..महंत जी कीं ऊंचा सुणता हा। जोर सूं बोलनै पूछ्‌यौ कुण चालतौ रह्यौ?--फुलवाड़ी
2.शिष्य परंपरा के अनुसार किसी गुरु गादी का अधिकारी, गद्दीधारी।
3.ब्राह्मण, पंडित। वि.--प्रधान, मुखिया।
रू.भे.
मंथ, महंति, महंती।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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