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महरम  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
अ.
1.रहस्शय या भेद, मर्म।
  • उदा.--प्यारा महरम दिल की जांणै, और न जांणै कोई बात नैं। मीरां दरसन कारण ढूरै, ज्यूं बालक झूरै मात नै।--मीरां
2.जो जनान खाने में जा सकता हो।
3.दोस्त, अंतरंग मित्र।
4.भीतरी रहस्य से परिचित।
5.कन्या की दृष्टि से वह सम्बन्धीया व्यक्ति जिससे उस कन्या का विवाह जायज न हो। (मुसलमान)
6.जानकारी।
  • उदा.--हरिया निज निरकार की, महरम बिन गम नांहि। एक अखंडी होत धूनि, सुनि सिखर कै मांहि।--स्री हरिरांमदासजी महाराज
रू.भे.
माहरम।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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