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मांद  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.स्त्री.
सं.मान्द्य
1.मन्दा होने की दशा, अवस्था या भाव।
2.अस्वस्थता, बीमारी, रूग्णता।
  • उदा.--1..भूख अर तिरस रै बिनाई घणां डर है। जगळी जिनावर, साज मांद अर बिच्छू--कांटां रा केई धया है।--फुलवाड़ी
  • उदा.--2..मावड़ियां तन मेणरा, मिटै कदै नह मांद। मावड़ियां ढूळा मरद, चूला हदा चांद।--बां.दा.
3.पीड़ा, दर्द। (अ.मा., ह.नां.मां.) (फा.)
4.हिसक जानवरों के रहने का विवर, खोह, गुफा, शेर की मांद। (सं.)
5.रवि या चंद्र सम्बन्धी ग्रहों की नीचौच्च या मंदोच्च गति।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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