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मित्त, मित्तर  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
देखो 'मित्र' (रू.भे.)
  • उदा.--1..तुम प्रीतम जे माहरौ मित्त, तुं हिवै कोइ न मेलै चित्त।--ध.व.ग्रं.
  • उदा.--2..महपाळ सिधां कुळ मित्ता रौ, पहपाळक संतां पीसा रौ। जग जाय जमारौ जीतारौ, सुज संभर सायब सीता रौ।--र.ज.प्र.
  • उदा.--3..दादू विरहौ पीड़ सौं, पड़ा पुकारै मित्त। रांम बिना जीपवै नहौं, पीव मिळन की चित्त।--दादूबांणी


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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