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मोसौ  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
1.व्यंग, ताना।
  • उदा.--1..राजा थांनूं मेहणौ सांचौ दियौ सत्य छै। कुड़ौ मोसौ दियौ न छै।--पंच दंडी री वारता
  • उदा.--2..उण म्हांनै चुड़लाळी मोसौ बोलियौ, मोसौ बोलियौ, जी म्हांरा राज।--लो.गी.
  • उदा.--3..डोकरी मुळक नै मोसौ मारती जबाब दियौ--जे राजा रै आखै खजांनै यूं ई प्रीत रौ भुगतांन व्हैतौ व्है तौ खजांनौ तौ थांरै पाखती है ई, पीठे प्रीत सारू भंवता क्यूं फिरौ।--फुलवाड़ी
2.कटुवचन, आक्षेप।
3.उपालंभ।
  • उदा.--1..इण गौर बंधिया रे कारणे, म्हारी नणदल मोसौ देवै रे, म्हारौ गौरबंध वळतौ कर।--लो.गी.
  • उदा.--2..कूड़ा कथन रखे करौ, सुंस कूड़ी साख। थांपण मोसौ मत करै, रिद्धि पारकी राख।--ध.व.ग्रं.
4.देखो 'मासौ' (रू.भे.)
रू.भे.
मूसौ, मौसौ, मोहौ।
क्रि.प्र.--दैणौ, बौलणौ, मारणौ, लगाणौ,


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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