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म्रिग           (स्त्रीलिंग--म्रिगी)  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.मृग
1.हरिन, मृग।
  • उदा.--1..काजळ की रेख जकौ लंकसी लगावै छै। तीखी चख रीज विधाता कीनी छै जकौ खंजन मीन म्रिग छलिनां छै।--पनां
  • उदा.--अहि खग म्रिग दम हंस अळूझै। सुणै न सबद गात नह सूझै।--सू.प्र.
  • उदा.--कसतूरी कमडळ, बसै, म्रिग ढूंढै वन वन। हरिया जुग जांणै नहीं, रांम वसै तन तंन।--स्री हरिरांमदासजी महाराज
2.जीव, प्राणी।
  • उदा.--चत्र दिस जाइ न सकै चक्रति, निजर काळ देखै नयण। म्रिग जीव सरण मारीजतौ, राख राख राधारमण।--जग्गौ खिड़ियौ
3.जंगली, पशु।
4.हाथी की एक जाति।
5.घोड़ों की एक जाति।
6.मार्गशीर्ष मास।
7.मृगशिरा नक्षत्र।
8.डिंगल में 'वेलिया सांणोर' (छोटा सांणोर) छैद का एक भेद--जिसमें प्रथम द्वाले में 14 लधु, 25 गुरू कुल 64 मात्राऐं तथा इसी क्रम में शेष द्वालों में 14 लधु 24 गुरू कुल 62 मात्राऐं होती हैं। (प्रिं.प्र.)
रू.भे.
मरग, मिरग, मिरिग्ध, म्रग, म्रगु, म्रध, म्रध्ध, म्रिग्ग, म्रिघ।
अल्पा.
मरगलियौ, मरगलौ, मरघलियौ, मरघामौ, मिरघणौ, मिरगौ, मिरलड़ौ, मिरगलौ, मिरछलौ, म्रगलउ, म्रगलौ, म्रिगलौ, म्रिगघलौ। मह.--म्रगांण, म्रगाळ।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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