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रंक  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
वि.
सं.रंक, रंक
1.गरीब, निर्धन।
  • उदा.--1..जग मांही जसवंत रौ, सीधौ हुतौ सुभाव। दिल उज्जाळ नहिं बदळतौ, रंक मिळौ चाहै राव।--ऊ.का.
  • उदा.--2..डोकरी कह्यौ--अठै वा बात कोनीं भाया, सगळां नै दूध एक सरीखौ मिळै, चाहै राजा व्है चाहै रंक, अर चाहै कोई लखपति सेठ-साहूकार व्है, चाहै कोई तोटायलौ।--फुलवाड़ी
  • उदा.--3..ताजदार बैठौ तखत, रज में लौटे रंक। गिणौ दुवांनूं हेक गत, निरदय काळ निसंक।--बां.दा.
  • उदा.--4..रोळै लेण लंक रा निसंक रा विभाड़ रांम, हाथां झौक रंक रा लंक रा देण हार।--र.ज.प्र.
2.दरिद्र, कंगाल।
  • उदा.--रंक कुकवि दोनूं रहै, कोस हूंत सौ कोस। आयां सुपन अलंक्रती, होण तणी नह होस।--बां.दा.
3.भिखारी, फकीर।
  • उदा.--माया पापनि पैस करि, कीया कळेजै घाव। हरीया बौह बळवंत कुं, रंक न पहुंचै राव।--अनुभववांणी
4.कृपण, कंजूस।
  • उदा.--खालिक मिळीया धिल खुसी, हरीया होय निहाल। पांनै पड़ीया रंक कै, कौडी बदळै लाल।--अनुभववांणी
5.क्षुधा पीड़ित, भूखा।
6.नीच।
  • उदा.--तिकै रंक चंडासिराज रा कुळ री कन्या किण रीति लहै।--वं.भा.
7.आलसी, सुस्त।
8.उदास, सुस्त।
रू.भे.
रंकि, रंकु, रंकू, रांक। अल्पा.रंकौ ।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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