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रद  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.
1.दांत, दंत। (अ.मा., डिं.को., ह.नां.मा.)
  • उदा.--1..साह सुजा गंजै समर, सांमंतां र सलेम। मद बिण पाछौ मेल्हियौ, जिंम्हग रद बिण जेम।--वं.भा.
  • उदा.--2..आणंद सु जु उदौ उहास हास अति, राजति रद रिखपंति रुख। नयण कमोदणि दीप नासिका, मेन केस राकेस मुख।--वेलि.
  • उदा.--3..इक अमर संग मतंग आंनन, मेक सित रद मंडितं। प्रम नेत हेत सिंदूर पूरित, पास स्रुति रव पंडितं।--रा.रू.
2.हाथी दांत।
  • उदा.--सिंधुर गाजै सिद्ध रा, आयौ किर आसाढ। ऐ तकियौ आसाढ नूं रद आसाढौ चाढ।--बां.दा.
3.चीर--फाड़।
4.खरोंच।
5.वस्त्र विशेष।
  • उदा.--रदां फरदां मुसवरां चौपसीदां ललचाव। कंदां केळमी कांमणी, वेहद हदां वणाव।--पनां
6.श्वेत। *(डिं.को.)
7.देखो 'रद्द' (रू.भे.)
  • उदा.--1..चाप बैर हर चाप, जाप धक्ख जपिया, उभै रांम जुध कारण, तांम अड़पिया। लछवर धनंख साथ तेज निज हर लिया, रद कर मद मुजरांम, अवधपुर आविया।--र.ज.प्र.
  • उदा.--2..अटक हीण असपती, पाप छित औसर पायौ। रद करबा रज्जियां, दुरद जेहौ मद पायौ।--रा.रू.
  • उदा.--आपा मारि मरै जो कोई, हरि धरगा मैं हटक न होई। आपा मारि मरै जनै सदका, विन आपै मूंवा सौ रद का।--अनुभववांणी


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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