HyperLink
वांछित शब्द लिख कर सर्च बटन क्लिक करें
 

रावळ, रावल  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.लाकुलि
1.राजपुताना के कुछ राजाओं की एक उपाधि। वि.वि.--रावळ, 'नाथ--सम्प्रदाय' की एक बड़ी शाखा है। यह शाखा वस्तुत: 'लाकुलीश पाशुपत सम्प्रदाय' की उत्तराधिकारी है। प्राचीन काल में इस प्रदेश (राजस्थान) पर उक्त लाकुलीश सम्प्रदाय का अत्यधिक प्रभाव रहा। कई प्रसिद्ध राजवंश इनके अनुयायी हो गये। जिसमें (1) मेवाड़ के राजकुल--इसके अन्तर्गत बप्पा रावळ प्रसिद्ध राजा हुआ, जिसने यह उपाधि धारण की, जो इस सम्प्रदाय का अनुयायी होने की द्यौतक है। (2) आबू के परमार। (3) जालौर के चौहान। (4) लुद्रवा (जैसलमेर) के भाटी--इनमें राजा देवराज को योगी रतननाथ ने राजतिलक करके 'रावळ' उपाधि दी थी। (5) इसी प्रकार मालाणी के मल्लीनाथ ने भी रतननाथ से 'रावळ' उपाधि प्राप्त की थी। इत्यादि। बाद में यह उपाधि परम्परागत हो गई और राजवंश के वंशजों तथा कतिपय राजवंशों द्वारा भी यह उपाधि धारण की जाने लगी। अत: मूल रूप में यह एक साम्प्रदायिक उपाधि है, जो राजवंशों के साथ लगाते रहने से कालान्तर में शासक (राजा) के लिये भी एक उपाधि बन गई। (6) कच्छ व जामनगर के जाडेचा भाटियों की उपाधि भी रावळ है।
2.उक्त उपाधिधारी राजा या शासक ।
  • उदा.--1..जो औ जगतसिंघ रौ बेटौ नै बुधसिंघ रौ छोटौ भाई, तिणसूं जैसळमेर अखैसिंघ पायौ। बडौ परतापीक रावळ हुवौ। वरस 40 राज कियौ।--नैणसी
  • उदा.--2..तैं सौ लाख समापिया, रावळ लालच छड्ड। सांसण सीचांणा जिसा, जेथ डुळै जळहड्ड।--बां.दा.
  • उदा.--3..जैत हथौ 'जैतो' जाळाहळ, उदियारांम तणौ दळ आगळ। मिणयड़ छात कलौ दळ मांहै, रावळ अणी थयौ कुळ राहै।--रा.रू.
  • उदा.--4..काँम घणा स्री रांम ना, कीधा स्री हणमंत रावत। तिमहुं स्री रावळ तणा, करस्युं कांम अनंत रावत।--प.च.चौ.
3.नाथ--सम्प्रदाय की रावळ शाखा व इस शाखा का योगी या साधु।
  • उदा.--1..बाई म्हारै नैना रावळ भेख। व स्वांमी वहो जटाधारी, अब ही अंजन रेख।--मीरां
  • उदा.--2..देव कहै रावळ पुछावौ। मोय आवै नहीं अवर को दावौ। मिळिस्यै जोगी नै संन्यासीं, मिळिस्यै तापस तीरथवासी।--जांभौ
4.भिक्षा--वृत्ति करने वाले जोगी जो नाद बजाकर, तथा विभिन्न बोलियां बोल कर भिक्षा--वृत्ति करते हैं। (मा.म.) [सं.राजकुल, प्रा.राअउल]
5.चारणों के याचकों का एक वर्ग या जाति।
  • उदा.--3..वेस्या सुख भोगै पति वरता व्याधी, इण सूं ईश्वर री ईस्वरता आधी। सावळ सुर साधक सुख सूँ नह सोया, सकुनीं सकुनावळ रावळ बळ रोया।--ऊ.का.
6.उक्त जाति का व्यक्ति।
7.प्रधान--सरदार।
8.बद्रीनारायण के प्रधान पंडे की उपाधि।
9.मथुरा के निकट एक गांव का नाम जहां राधिका का जन्म हुआ था।
10.एक ब्राह्मण वंश।
रू.भे.
राउळ, राउल।
विशेष विवरण:-इस जाति या वर्ग की उत्पत्ति के सम्बन्ध में इतिहास मिलता है। इस जाति के व्यक्ति जूनागढ की चूड़ासभा यादव शाखा के क्षत्रिय हैं और महाराज नौधण की संतान हैं। एक बार जूनागढ के नरेश राव माण्डलिक ने चारण जाति की नागबाई, जो देवी का अवतार मानी जाती थी, की पुत्रवधू को कुदृष्टि से देखा। इस पर नागबाई ने क्रुद्ध होकर रावं माण्डलिक को पुंसत्वहीन होने का शाप दिया और समूची चूड़ासमा शाखा को राज्यच्युत कर दिया। इस शाप से ग्रसित होने पर मांडलिक ने नागबाई से बहुत क्षमा--याचना व अनुनय--विनय की। तब देवी ने उसको नपुंसत्व से मुक्त कर दिया और कहा कि तेरी संतान चारणों की याचना करेगी और उनको रिझाने के लिये, उनके सम्मुख गाना--बजाना व खेल तमाशा करेगी। अत: तब से वे चारणों के याचक हुए। रावळ प्राय: चारणों के अतिरिक्त किसी अन्य के सामने तमाशा नहीं करते और यदि कारणवश करना पड़े तो वहां किसी चारण की उपस्थिति अनिवार्य है।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

Project | About Us | Contact Us | Feedback | Donate | संक्षेपाक्षर सूची