सं.पु.
सं.रिपु:
1.शत्रु, वैरी, दुश्मन।
- उदा.--1..करि सारत अस दब्बि ईख नरपत्ति आडंबर। सिर संकर दौड़ियौ, जांण कोपै रिपु संबर।--रा.रू.
- उदा.--2..सादूळ अमंगळ सिह सावज, ग्रीठ केहर मयंद रिपु गज। बांण बाघ लंकाळ वनरज, दोख गम दाढाळ।--गु.रू.बं.
- उदा.--3..जरा रिपु भेसज के ढिग जाय। महाजन जांमण मरण मिटाय।--ऊ.का.
- उदा.--4..भूप अनम्मी भाळबा, घण रिपु करण संहार। ऐ कूरम इळ पर उभै, जनम्या डूंग जुहार।--डूंगजी जवारजी रौ गीत,
- उदा.--5..रिपुग्ग देत्य कंस सी, अजेत सुल्लती रहे। विजेत बीर बंस की विनेत घल्लती बहै।--ऊ.का.
2.गुणों की दृष्टि से वह वस्तु जो किसी अन्य वस्तु के प्रभाव या गुणों को नष्ट करने की क्षमता रखती हो।
3.जन्म कुण्डली में लग्न से छठा स्थान।