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रिपु, रिपुग्ग  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.रिपु:
1.शत्रु, वैरी, दुश्मन।
  • उदा.--1..करि सारत अस दब्बि ईख नरपत्ति आडंबर। सिर संकर दौड़ियौ, जांण कोपै रिपु संबर।--रा.रू.
  • उदा.--2..सादूळ अमंगळ सिह सावज, ग्रीठ केहर मयंद रिपु गज। बांण बाघ लंकाळ वनरज, दोख गम दाढाळ।--गु.रू.बं.
  • उदा.--3..जरा रिपु भेसज के ढिग जाय। महाजन जांमण मरण मिटाय।--ऊ.का.
  • उदा.--4..भूप अनम्मी भाळबा, घण रिपु करण संहार। ऐ कूरम इळ पर उभै, जनम्या डूंग जुहार।--डूंगजी जवारजी रौ गीत,
  • उदा.--5..रिपुग्ग देत्य कंस सी, अजेत सुल्लती रहे। विजेत बीर बंस की विनेत घल्लती बहै।--ऊ.का.
2.गुणों की दृष्टि से वह वस्तु जो किसी अन्य वस्तु के प्रभाव या गुणों को नष्ट करने की क्षमता रखती हो।
3.जन्म कुण्डली में लग्न से छठा स्थान।
रू.भे.
रिप, रिपव।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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