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रीति, रीती  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.स्त्री.
सं.रीति:
1.गीत या गायन की लय तर्ज।
  • उदा.--सदा प्रिया सु प्रीति रीति, गीत सारणी नहीं। निसास रोज आंननी, उरोज धारणी नहीं।--ऊ.का.
2.संस्कृत साहित्य मैं किसी विषय का वर्णन करने में वर्णों की वह योजना जिसमें ओज, प्रसाद या माधुर्य आता हो। यह चार प्रकार की मानी गई है।
3.राजस्थानी या हिन्दी साहित्य की मध्य युगीन काव्य रचना की प्रणाली या शैली विशेष जो आचार्यों द्वारा निरुपित शास्त्रीय नियमों, लक्षणों आदि पर निर्भर थी। और जिमसें वर्ण मैत्री, अलंकार जया उक्ति, पिंगल (छन्द शास्त्र), रस आदि का पूरा ध्यान रखा जाता था। इस प्रकार के ग्रंथों के नाम, रीति ग्रन्थ कहलाते थे। जैसे राजस्थानी में रघुनाथ रूपक, रघुवर--जस--प्रकास आदि।
4.देखो 'रीत' (रू.भे.)
  • उदा.--1..रोकी तै कुरीति रीति सुरीति को झोंकी साथ, ताकत त्रिलोकी ऐसौ मत अवगाह्यौ तैं।--ऊ.का.
  • उदा.--2..दांन देन सिख्यौ आंन राखन कौ सीख्यौ दिव्य, सीख्यौ थांन ग्यांन मांन मुद्ध सीख्यौ तू। साहस सरीर सीख्यौ नीर छीर प्रीति सीख्यौ, सीख्यौ धीर रीति वड वीर बुद्धि सीख्यों तू।--ऊ.का.
  • उदा.--3..रीती को लिहाज विपरीत ना लिहाज राख्यौ, राख्यौ मांन मांन कै न हांन वीच राख्यौतैं।--ऊ.का.


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास

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