सं.स्त्री.
फा.रुख
1.कपोल, गाल।
3.चेहरे का भाव, चेष्टा या आशय।
- उदा.--1..सत्र सारत समधा सब कोई, जड़लग वह गई संग जिनोई। मुहकम रुख चख जांण कमाळी, सिर चलतै केवांण संभाळी।--रा.रू.
- उदा.--2..दीवांणजी तौ ई रुख नीं मैळ्यौ। होळै सीक जाडा सुर में कह्यौ--म्हैं जांण्यौ के राजाजी कोई कांम भेज्यौ दीसै।--फुलवाड़ी
- उदा.--3..काका बाबा भ्रात कवि, हूवै दूर रुख हैर। संत महंत न संचरै, पातर रै पग फेर।--बां.दा.
4.मनोभाव।
- उदा.--उण रौ रुख देखण सारू दीवांणजी जांण करनै अैड़ी बात करी ही। पण वा तौ साव इज भोळी निकळी। बोली--घरटी फेरण री कोई मेहणी थोड़ी ई लागै, नवी बींदणी नै ई फेरणी पड़ै।--फुलवाड़ी
5.इच्छा।
- उदा.--1..थेट सूं भायां थकां जयसिंहजी री रुख औरंगजेब सूं ही रही।--महाराजा जयसिंह आंमेर रा धणी री वारता
- उदा.--2..चिगतां उखेल पखरै चरित, रक्खै मेळ अमेळ रुख। वध वेव बळै खळ वांस ज्यूं, दाह जळै उर साह दुख।--रा.रू.
6.कृपा दृष्टि, महरबानी।
- उदा.--1..बडौ कुंअर अमरसिंह। बडौ मोटौ सिरदार मांटीपणै रौ आंक सो तीं पर महाराज री रुख नहीं।--ठा.राजसिंह री वारता,
- उदा.--2..तिकां सिर दया रुख होय हरि तौ तणी, किणी दिन न लागै जिकां आतंक।--र.ज.प्र.
8.शतरंज की किश्ती या हाथी नामक मोहरा।
9.प्रकार, तरह, भांति।
- उदा.--1..रीझवाळा नयण महोदधतणी रुख, खीजवाळा नयण बीज रौ खेल।--बखतौ खिड़ियौ,
- उदा.--2..पड़ उसताज आहणै असपत, दुजड़ै देतौ खळां दुख। केस केस संधियौ केळपुरा, रावळ अंबर तणी रुख।--महारांणा अमरसिंह रौ गीत,
- उदा.--3..उण ठांम तपै हाडौ अनड़, पुर गढ ले जावद प्रमुख। संताप चितौड़ सिर, रहियौ एकल बाघ रुख।--वं.भा.
- उदा.--1..आणंद सु जु उदौ उहास हास अति, राजति रद रिखपंति रुख। नयण कमोदणि दीप नासिका, मेन केस राकेस मुख।--वेलि.
- उदा.--2..मणियां रयण अमोल, रोप अणियां मोती रुख।--वं.भा.
- उदा.--म्हैं थांनै आली वरजिया हे, रघुवर रुख मत जोय। सुख री सीख सुणी नह जद, बैठी तन मन खोय।--गी.रां.
- उदा.--अत कोप मुखां चख रोस अड़ै। झळ आग लगीं किर दूंग झड़ै। जपतै रसणा रुख वांण जुई, हित बादळ बीज सरोस हुई।--रा.रू.