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ललक
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.स्त्री.
1.गहरी अभिलाषा।
2.लोच, लचक, झुकाव।
3.प्रोत्साहित करने की क्रिया या भाव।
उदा.--
1..कलक वीरां
ललक
भड़ां अहंकारीयां, धारीया खत्रीवट धड़ै धूरै। कळाधर फाबियौ ईस वाळै कमळ, भुजा यम ढाबियौ दुरंग भूरै।--पीरदांन आढौ,
उदा.--
2..तौ आरबखां हाथी रै होदै बैठौ
ललकां
करै है वा कबांण कनै है।--द.दा.
4.गायन की तीखी व ऊँची ध्वनि।
उदा.--
1..लाग सिंधवां
ललक
, खलक हक बक धूजै खित। करण टूक केवियां, रूक रण रहत रूक रत।--गिरबरदांन कवियौ,
उदा.--
2..सहनाइन लागी
ललक
सिंधु सुणवाया।--वं.भा.
5.पक्षियों का मधुर कलरव, मीठी ध्वनि।
उदा.--
घुमड़ै कांठळ आय, चढी घनघोर की।
ललकां
कोयल लार, किलका मोर की।--महादांन मेहड़ू,
रू.भे.
ललक्क।
नोट:
पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।
राजस्थानी भाषा, व्याकरण एवं इतिहास
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