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लाग  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.स्त्री.
1 लगने की क्रिया या भाव।
  • उदा.--तन जोबन दिन चार के, तुं तन पहली त्याग। नही तौ तोकुं त्यागसी, हरीया रहौ न लाग।--अनुभववांणी
2.अनुराग, प्रेम, मोहब्बत।
  • उदा.--जिण भांत सूरज नै धूप, इण भांत बिरह नै लाग रौ एक रूप। लाग री सोभा हाती चढियां जिसी, लाग। बिना जिके पयादां समांन जांरी गिणती ही किसी।--र.हमीर
3.लगन, लौ।
  • उदा.--दो कुळ त्याग भई बैरागण, आप मिळण की लाग (के काज) मीरां के प्रभु कब र मिळोगे, कुबज्या आई कांई याद।--मीरां
4.इच्छा, चाह।
  • उदा.--मिथ्या द्रस्टि देव सूं, धरियउ पूरउ राग। अरथ तणउ अनरथ कियउ, देखी नइ निज लाग।--विनय कुमार कृत कुसुमांजलि
5.सम्बन्ध, सम्पर्क।
6.ईर्ष्या।
  • उदा.--औ दूहौ कुंवर कहीयौ ता पाछै लोग सरब कुंवर सुं लाग करै। तद लोकां तौ राजा री छोटी रांणी नुं भखाया नै कही जो वीरभांण ना कढावौ तौ राज थांरौ हुवै।--चौबोली
7.मौका, अनुकूल परिस्थिति।
  • उदा.--पिरि कहुँ जु पीहरि जाइ, आज छि ए लाग, सुख पांमि सुंदरि, मुझ मोकलु थाइ पाग।--नळाख्यांन
8.नेग। वि.वि.--देखो 'नेग'
9.दक्षिणा।
  • उदा.--गुरूजी ने गुरां कर थापिया नै कयौ, इण देस मांहै मांहरी जेत होसी तौ मांहरां पुत्र पोता मांहरी साख रा होसी सौ राज नै गुरु कर मांनसी नै व्याह रौ लाग, चवरी रौ लागभाग दीवौ, जोड़ो खीरोदक रौ, जायै परणियै गुरुजी नै देसी।--रा.व.वि.
10.शाक विशेष में दिया जाने वाला बेसन का मिश्रण या पुट।
11.लगान, भूमिकर।
12.किसी नशे आदि का व्यसन। क्रि.प्र.--लागणौ
13.एक प्रकार का नृत्य।
14.प्रतिस्पर्धा, होड़। वि.--योग्य, काबिल। क्रि.वि.--लिए, वास्ते। (वं.भा.)


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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