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वली  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.स्त्री.
सं.
चर्म या चमड़ी की सिकुड़न, झुर्री।
2.पेट के दोनों ओर पेट के सिकुड़ने से पड़ी हुई लकीर।
3.पंक्ति।
4.रेखा, लकीर।
5.उत्तराधिकारी, वारिस।
रू.भे.
बळि।

वळी, वली  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.स्त्री.
देशज
1.पहाड़ के नीचे की भूमि, लम्बी भूमि।
  • उदा.--पंवारां री पैंतीस साख, त्यां मांहै एक साख भायलां री, भायलां रौ माथासरौ गांव रोहीसी मगरा नीचै वळी छै तठै नै सिवांणचीनूं।--नैणसी
2.रेतीलै टीबै पर प्राकृतिक रूप से बनी लहरनुमा उभरी रेखाएं ।
3.रीढ़ की हड्डी, मेरुदंड।
4.सीधा रोपा जाने वाला वह काष्ठ का डंडा जिस पर धनुषाकार लकड़ी रखकर उस पर बैठकर चक्कर काटा जाता है। वि.वि.--देखो 'चकचूंदियौ'
5.रुपया-पैसा। सं.पु.(अ.)
6.वह धर्मात्मा और महात्मा व्यक्ति जो ईश्वर की दृष्टि में प्रिय और मान्य हो।
7.शासक, बादशाह।
  • उदा.--अकबर साह जलालदी, खितवा वली खुदाय। वाजदार कर बंदगी, ताजदार हुय जाय।--बां.दा.
8.हाकिम।
9.देखो 'वळि' (रू.भे.)
  • उदा.--1..एक सुयखंध इणि अंग नउजी, वरग छइ आठ अभिरांम। आठ उद्देसा छइ वली जी, संख्याता सहस पद ठांम।--विनय कुमार कृत कुसुमांजलि
  • उदा.--2..अगनि में बांण छूटा असंख, वळी वीढ़ चिहुँवै वळां। पछि वांण हुवौ पूठीरुखौ, 'गजण' तांम दिल्ली दळां।--गु.रू.बं.
  • उदा.--3..जासक कटक आंपणइ ठांमि, गुजराति आवसइ अनांमि। करि वीबाह मनि आंणी रुली, छपन कोडि धन देसइ वली।--कां.दे.प्र.
रू.भे.
बळी, बली।


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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