सं.पु.
सं.विधि:
1.काम करने की रीति, क्रिया या व्यवस्था
- उदा.--1..आगळि पित मात रमंती अंगणि, कांम विरांम छिपाड़ण काज़। लाजवंती अंगि एह लाज विधि, लाज करंती आवै लाज।--वेलि.
- उदा.--2..प्रतिदिन होत वेद विधि पूजन, घुरियत तत आनद्ध सिसर धन। धूप दीप नैवैद पुस्य फळ, कस्मीरज मलयज नागज कळ।--मे.म.
2.तरह, प्रकार, भांति।
- उदा.--1..दिऔ सेत वरदांन तू, परमेसरि प्रस्ताव। राजांन री रस-कथा, विधि कहि वात वणाव।--रा.सा.सं.
- उदा.--2..दुविधि अंन पल त्रिधा, साग पंच मांस धारण। गौ रस जुग विधि गिणित, मिस्ट गति ए कवि चारण।--रा.सा.सं.
- उदा.--3..आप इसी हित चित इकतारी, न्रपती कह्यौ आंण सुजि नारी। देतां द्रब करतां जुध दावै, आंणौ जेण तेणि विधि आवै।
4.कार्यक्रम, प्रणाली, ढंग, नियम, कायदा।
- उदा.--1..मिळि मंत्री परधांन मैं, विधि दक्ख़ै विच्चार। जळ रखण गढ जोधपुर, कै रक्खौ जोधार।--गु.रू.बं.
- उदा.--2..तब रुखमणीजी डावै पासै बैसांण्यां। ज्यौं विधि छै त्यौं बोल वाचां लै। ज्यौं कही छै त्यौं करि नै विवाह पूरण कीयौ। तिहि वेळां वेद का पठणहारां। मुँहमांगी सु नवही निधि पाई।--वेलि.टी.
- उदा.--विधि सहित वधावै वाजित्र वावै, भिन भिन अभिन बांणि मुख भाखि। करै भगति राजांन क्रिसन ची, राजरमणि रूखमिणि ग्रह राखि।
6.ढंग।
- उदा.--सहिजि उल्लंघइ सुर सरी, नीकन नेडी थाइ। वज्र तणी विधि अंगमइ, कुसुम सरीखी काय।--मा.कां.प्र.
8.भेद, रहस्य।
- उदा.--ताहरां आ बोली, 'न हुं सासरै वहू, नां पीहर बेटी, अय विचाळै ऊभी छूं। ताहरां औ बोलियौ, 'ईयै रौ जाब कीसूं? युँ क्युं ऊभा? मोनुं थांहरै मन री विधि कह्यौ।'--कांवळौ जोईयौ नै तीडी खरळ री वात
10.सृष्टिकर्त्ता, विधाता, ब्रह्मा। (ह.नां.मा.)
- उदा.--1..बोल नवाब सरस द्रढ बंघै, सुत पितु हूंत महा छळ संधै। यूं रिम सूरत सूत प्रबंधै, नेम लियौ विधि जेम निमंधै।--रा.रू.
- उदा.--2..जोग नींद बस भयै निरंजन, गज्जै असुर पितामह गंजन। आकृति विकट निकट चलि आयै, काढि दसन विधि ग्रसन धिकायै।--मे.म.
- उदा.--3..नारी सोवै है अपणै घर, सांई रै साथ सुहांणी है। नारी है विधि री अनुप विधा, नारी री अलग कहांणी है।--करणीदांन बारहठ
14.विधान, नियम।
- उदा.--1..उरदेव समरथ एक, उतपात पेख अनेक। असहाय थांन आपार, विधि भरम क्रम विसतार।--रा.रू.
- उदा.--2..करता अरु अकरता तिरगुण, खंग ब्रह्म मांई सगुणनिरगुण। विधि निखेध खंगम होई, सब्द ब्रह्म द्रस्टा निज सोई।--स्रीसुखरांमजी महाराज
- उदा.--3..विधि निखेध करम नहिं क्रिया, बुद्धि उगत थकांणी। संत सुखरांम परम प्रकासी, आपी कूं आप पिछांणी।--स्रीसुखरांमजी महाराज
- उदा.--4..मयणा कहै कर जोडि नै, भगवत्! पूछूं तुझ, ऊजमणां नी विधि कह्यौ, समझावीनै मुझ। मुनि कहै सांभळ स्राविका, एक नी विधि छै भुरि, नांम मात्र तुझ नै कहूं, पांमिस सुख भरपूरि।--स्रीपाल रास
16.साहित्य में अर्थालंकार।
17.व्याकरण में किसी को कुछ करने के लिए दी गई आज्ञा का स्वरूप।
रू.भे.
बिद्ध, बिध, बिधि, बिहि, ब्रधी, विद्धि, विध्य विह।