सं.पु.
सं.
1.संयोग का अभाव। (डिं.को.)
- उदा.--1..कोइक पूरब भव संबंध सुं रे आइ मिल्यौ संजोग। भवितव्यता रइ जोग मिलइ इस्यौ रे, वणियौ एम वियोग।--प.च.चौ.
- उदा.--2..रहै नहीं नांमै कोइ रोग, वली सहु जायै सोग वियोग। सदा हुवै भोग संयोग सबेव, दीयै सुख वछित रीखभदेव।--ध.व.ग्रं.
2.विच्छेद, अलगाव।
- उदा.--1..स्वांमीजी नवी दिक्षा लीधां पछै केतलैएक वरसै तीन जणियां दिक्षा लेवा त्यारी थइ। जद स्वांमीजी बोल्या थैं तीन जणियां साथै दिक्षा लेवौ अनैं कदाचित एकण रौ वियोग पड़ जावै तौ दोयां नै कल्पै नहीं सो पछै संलेखणा करणी पड़ै।--भि.द्र.
- उदा.--2..जकै व्यापार करै छै। त्यांह की स्त्री, गाय अर बछड़ा। बिभचार ही करणहारी स्त्री अर लंपट। ये तीन्यौ रात्रि कै समै भेळा हुता त्यांह नै वियोग हुऔ।--वेलि.टी.
- उदा.--3..नाह वियोगै दुखणी तेह, झूरि क्रस कीधौ छै देह। रहै एकांतै लेइ आवास, धरम ध्यांन मन मांहै जास।--विनय कुमार कृत कुसुमांजलि
4.विरह, जुदाई।
- उदा.--1..दसरथ राय दियौ देसवटउ, रह्यउ वनवास जी। वलि वियोग पड़्यउ सीतानउ, आठं पहर उदास जी।--स.कु.
- उदा.--2..खसबोय लगाई। आप ढोलियै पोढियौ। भरमल पवन करै छै। वडारण पगै हाथ देवै छै। वातां करै छै। खुस-वखत छै हसै छै। घणां दिनां रौ वियोग भागौ, सौ दोनुं परम राजी छै।--कुंवरसी सांखला री वारता
5.साहित्य में एक प्रकार का अलंकार विशेष जिसमें प्रेमी-प्रमिकाओं के विरह का वर्णन होता है। वि.--बिना, रहित। क्रि.वि.--अलग, वियोग में ।
रू.भे.
बिओग, बिजोग, बियोग, बिवोग, वजोग, विओग, विजोग।