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वेस  
शब्दभेद/रूपभेद
व्युत्पत्ति
शब्दार्थ एवं प्रयोग
सं.पु.
सं.वेश:
1.पहनने के वस्त्र, पोशाक, वेश।
  • उदा.--1..कोई वीर स्त्री भागल पत्ती नै कहै छै--हे कंथ। आप भलां भाग नैं जीवता घरै आया। अबै म्हारौ वेस धारण करावौ। अबैं म्हनै आं चूड़ियां सूं लाज आवै छै सो हूं तौ हमै चूड़ियां पैले जनम भेटसूं।--वीर सतसई की टीका
  • उदा.--2..अेक दिन सिंझ्यां रा घोड़ा माथै बैठौ वौ यूं ई बिरथा तबड़का मारतौ हौ कैं उणनै सरवर री पाळ सूं उतरतौ पिणियार्‌यां रौ झूलरौ सांम्ही धकियौ भांत-भांत रा सुरंगां भांत-भांत रा रूपाळा उणियारा। रूं रूं में जोबन छळकै।--फुलवाड़ी
  • उदा.--3..पछै समेट खांम कर थेली में घात कागळ प्रोहित नुं पहुँचायौ। थिरमौ एक वेस एक जनांनौ अवल, रुपीया सब इतरा प्रोहित नुं बिदा रा मेलिया। मण एक सीरावणी मारग री मेली।--कुंवरसी सांखला री वारता
2.कपड़े आदि पहनने या पहन कर सजने या किसी अन्य को पहना कर सजाने का ढंग, तरीका।
  • उदा.--1..अर आप न हालौ तौ कन्या नूं तरुणी हुई जांणि चंद्राउतां पुरोहित रौ धरणौ दिवाई मोनूं बींद रौ वेस कराइ साहस थी आंणियौ तौ भी दिल्ली रा दूत दसोर पूगा जांणि पाछौ ही पलाईजै।--वं.भा.
  • उदा.--2..पछे नरबद छांनौ घोड़े-वहल वेस ने जैतारण था कोस1 अरट छै तठै रहौ। सु सुपियारी आथण री मजूरणी रौ वेस करने माथै घड़ौ लै नीसरी।--नैणसी
  • उदा.--3..आज निसह म्है चालिस्यां, बहिस्यां, पंथी वेस। जउ जीव्या तउ आविस्यां, मुया त उणि हिज देस।--ढो.मा.
3.रंगमंच के पीछे का स्थान।
4.भीतर जाने का रास्ता, प्रवेश द्वार।
5.वेश्याओं का मोहल्ला।
6.वेश्या का घर।
7.शरीर, दहन।
  • उदा.--1..आवइ आवासि आपणइ पगि लूहंता केस। पुण्य हुई तु पांमीई, वेसया केरु वेस।--मा.कां.प्र.
  • उदा.--2..सुदरभाल विसाळ, अलक सम माळ अनोपम। हित प्रकास म्रदु हास, अरुण वारिज मुख ओपम। क्रपा धांम नव कंज, नयण अभिरांम सनेही। रुचि कपोल ग्रीवा त्रिरेख, छवि वेस अछेही। निरखंत सत सनमुखा निजर, करण पुनीत सु प्रीत कर। गुण मांन दांन चाहै सु ग्रहि, कवि सुग्यांन औ ध्यांन कर।--रा.रू.
8.स्थिति, हालत, अवस्था।
9.रूप, सौन्दर्य।
10.रूप, स्वरूप। (सं.वेश)
11.एक दानव जो आयु राजा की रक्षार्थ देवराज इन्द्र के द्वारा मारा गया था।
वि.
1.विशेष, श्रेष्ठ, बढ़िया।
  • उदा.--1..अै वस्तुआं आपरैं हीज लायक छै, म्हारै लायक नहीं तद रावजी राखी। घोड़ौ एक निपट वेसथौ सौ रावजी राखियौ।--ठाकुर जैतसी री बात
  • उदा.--2..कुतक खिदर धव काठ रा, विदर पजावण वेस। तौ पिण हाजर राखण, घण मेखचा हमेस--बां.दा.
  • उदा.--3. दिस बतावौ ब्रहन कूं पाऊं वेस । भिळियां भ्रांती भागसी, जासी सबै अन देस।--स्रीहरिरांमजी महाराज
  • उदा.--4..सदा मनोरथ सुभ करण वांणी अख्यर वेस। सारां पहली समरियै, गवरी पुत्र गणेस।--पनां
2.देखो 'बेसर' (रू.भे.)
  • उदा.--
  • उदा.--मुहतउ लेई सवि समुदाय आव्यु जिहां बइठउ छइ राय। न्रप आयस लही वर वेस रंगंगणि कीधउ प्रवेस।--हीराणंद सूरि
4.देखो 'वेस्य' (रू.भे.)
  • उदा.--कुण खत्री कुण ब्राह्मण, चत्र वेद चवंदा। विणज विसाऊ कुण वेस कुण सुद्र कहंदा।--केसोदास गाडण
5.देखो 'वयस' (रू.भे.)
  • उदा.--1..आळस वाळा राजवी घर रा घर मैं दारू पी रोटी खाय सूय रैणौ, घर रौ कांम परोपकार, वीरता, देस सेवा, आदि अच्छा कांम न करणा मैं व्रथा यूं ही वेस ऊंमर गमावै है।--वीर सतसई की टीका
  • उदा.--2..हैंम वरनी हेम गिर, बाली लहुवै वेस। कंथ विहुंणी कांमणी साचौ कहि संदेस। सांचौ कहै संदेस वैंण मीठा करूं, राज मुदै पर हथ्थ रंग महिलां धरूं।--मा.वचनिका
  • उदा.--3..हंसै सारी नाग नारी उचारी विहारी हूंत, सवारी पधारी बळै लेतौ आज़ै सूंक। कठै थां री वेस असी जुद्धकारी बातां करै, फूणांधांरी दीठौ न छै आगकारी फूंक।--मुरारीदास बारहठ
  • उदा.--4..सैसव तनि सुखपति जोवण न जाग्रति, वेस संधि सुहिणा सु वारि। हिव पळ पळ चढतौ जि होइ सै, प्रथम ग्यांन एहवी परि।--वेलि.
  • उदा.--5..देवी रक्त नीलमणी सीत रंगं, देवी रूप अंबार वीरूप अंगं। देवी बाल जूवा व्रधं वेस वाळी, देवी विस्व रखवाळ वीसां भुजाळी।--देवि.
रू.भे.
बेस, बैस, वेख, वेसि, वैस।
क्रि.प्र.--करणौ, कराणौ, देणौ, धारणौ, पहरणौ, पहराणौ, बदळणौ, बदळाणौ, लेणौ।
3 देखो 'वेस्या' (रू.भे.)


नोट: पद्मश्री डॉ. सीताराम लालस संकलित वृहत राजस्थानी सबदकोश मे आपका स्वागत है। सागर-मंथन जैसे इस विशाल कार्य मे कंप्युटर द्वारा ऑटोमैशन के फलस्वरूप आई गलतियों को सुधारने के क्रम मे आपका अमूल्य सहयोग होगा कि यदि आपको कोई शब्द विशेष नहीं मिले अथवा उनके अर्थ गलत मिलें या अनैक अर्थ आपस मे जुड़े हुए मिलें तो कृपया admin@charans.org पर ईमेल द्वारा सूचित करें। हार्दिक आभार।






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